ज्योतिषाचार्य डॉ हिमांशु पंत ने कालसर्प योग के बारे में दी विशेष जानकारी

490 0

पिछले कई समय से ठग ज्योतिष के नाम पर लूटने वाले कालसर्प योग के नाम से लोगो को डराते है तो आये कालसर्प योग आखिर है क्या (ज्योतिषाचार्य डॉ हिमांशु पंत)

ज्योतिषाचार्य डॉ हिमांशु पंत ने बताया की काल सर्प योग
फलित ग्रंथो में नाम तक नहीं काल सर्प योग ऋषि मुनियों ने इस कुयोग का अपने फलित ग्रंथो में नाम तक नहीं लिया राहू और केतु दोनों के मध्य इधर या उधर (७) ग्रहों की स्थिति को कालसर्प योग के बारे भयावह संज्ञा दी गई है, इस योग के अविष्कारको का कहना है की इस योग में उत्पन्न जातक अस्वास्थ्य, बंधू वियोग,शिक्षा में विघ्न, असाध्य रोग, जीवनसाथी से वियोग\अनबन, सन्तति से कष्ट, सन्तति का अभाव, दारिद्र शत्रु से हानी, व्यवसाय में नुकसान, अपयश,अकालमृत्यु आदि सभी प्रकार के दुर्भाग्य का शिकार होता हैं उनकी यह चेतावनी है की इस योग में उत्पन्न व्यक्ति यदि सुख समृद्धि सम्पन्न भी है तो भी भविष्य में कभी न कभी इसके कुप्रभाव का शिकार अवश्य बनता है. इसकी भीषण कुफल श्रुंखला से बचने के लिए जातको के इन शुभचिंतक ज्योतिषियो ने व्यय करने व विविध अनुष्ठान सुझाये है, जिनके विधान से इस कुयोग का प्रभाव समापत हो न हो उनकी जेब का पैसा अवश्य समाप्त हो जाता है. काल सर्प योग और इसके डराने वाले कुफलो की दीर्घ सूचि ज्योतिष के किस ग्रन्थ से
निकली है यह बताने में इस योग के प्रवर्तक, प्रचारक और प्रायोजक देवज्ञ महानुभाव अपनी स्पष्ट अज्ञानता प्रकट करते है. राहू केतु को ज्योतिष शास्त्रियों ने लगभग छठी शताब्दी तक ग्रहों की कोटि में नहीं रखा. हमारे प्राचीन वशिष्ठ, नारद व्रुहद्सहिंताओ तथा वृहद जातक आदि मूल जातक ग्रंथो में इन दोनों का सूर्य आदि ग्रहों के साथ नहीं रखा गया है, और इसलिए इन से सम्बद्ध किसी भी प्रकार का
फलादेश भी नहीं है. सूर्य सिद्धांत आदि सिद्धान्त ग्रन्थ भी इनके ग्रहत्व के बारे में मूक है. वह इन्हें सूर्य चन्द्र के भ्रमण वृत्तो के दो सम्पात मात्र बताया गया है जो वक्र गति से चल रहे है और सूर्य चन्द्र के ग्रहणों का इन्हें सिर्फ कारण मात्र बताया गया है. अति प्राचीन काल में चीनी ज्योतिषयो की यह धारणा रही है की ग्रहण के समय एक काल सर्पाकार दैत्य (ड्रैगन) आपने कुंडलित शरीर से ढका करता है, इसी धारणा के अनुसार हमारे सिद्धान्त और फलित ग्रंथो में भी इन्हें (राहू व केतु को ) सर्प की संज्ञा दी गयी है, जो की एक ही सर्प के सिर और पूछ है. इसी धारणा के प्रभाव में काल सर्प योग में इन्हें साक्षात् सर्प बताकर इस योग को भयंकर बनाना इन चतुर ज्ञानियो का उद्देश्य है. आश्चर्य है की इस योग के परिपालक ज्ञानियो ने इसे प्रमाणिक सिद्ध करने के लिए पुस्तके भी लिख डाली, जहा व्यर्थ की सूक्ष्मता दिखाते हुए इस योग को अनेक काल्पनिक भेद प्रभेदो में बांटा है और उन सबके स्वकल्पित तंत्र मंत्र अनुष्ठान भी
पुस्तको में दिए है. पुस्तकगत इससामग्री के मूल स्त्रोत के बारे में वे सर्वदा मूक है. काल सर्प नामक इस तथोक्त कुयोग से डरने का कोई कारन नहीं है. ध्यान रहे हमारे फलित ज्योतिष के प्रवर्तक एवं व्याख्याता वशिष्ठ, नारद, गर्ग, भृगु, जैमिनी, पाराशर आदि किसी भी ऋषि मुनि ने इस कुयोग का अपने फलित ग्रंथो में
नाम तक नहीं लिया है. जिसने फलित साहित्य का भली भांति अध्ययन किया है, वह जानता है कि इस नाम का कोई योग नहीं है. यह किन्ही अनैतिक दैवग्यो की षडियंत्र मात्र है, जिससे वे ज्योतिष शास्त्र से अनभिज्ञ ज्योतिष को दिव्य ज्ञान समझने वाले श्रद्धालु भोलीभाली जनता से अच्छी धनराशी समेट रहे है. यही नहीं पाश्चात्य
फलित शास्त्र भी इस योग की चर्चा से सर्वथा अस्पृष्ट है, हा हमारे जातक ग्रंथो में वर्णित एक सर्प नामक योग अवश्य हमें मिलता है, जो केंद्र में तीन (किसी के मत से चार) शुभ ग्रहों एवं
अन्यत्र सभी अशुभ ग्रहों की स्थिती से बनता है, स्पष्ट है इस सर्प योग का काल सर्प योग से कोई सम्बन्ध नहीं है. विगत ४०-५० वर्षो से ही इस दुर्योग का भूत उत्तर भारतीय देवग्यो में प्रवेश
हुआ है. इससे पूर्व यह दक्षिण भारत में प्रचलित रहा. इसकी अशास्त्रीयता, अप्रामाणिकता के कारण उत्तरी व दक्षिणी भारत के भी प्रबुद्ध ज्योतिर्विदों ने इसके अस्तित्व को बुरी तरह नाकारा है. इसके विरोध में सैकड़ो लेख भी प्रकाशित हुए है, लेकिन कुछ ज्योतिषयो द्वारा बढ़ा चढ़ा के कहने के कारण जातक इतना आतंकित हो उठते है की वे बताये गए सारे उपाय करने को नासिक के त्रिम्बकेश्वर मंदिर में जाते है और कुछ तो शिवालय या नाले नदियों के किनारे भी इनके उपाय करवा देते है और इस योग के तथाकथित कुप्रभाव से मुक्ति पाने वाले पीड़ित लोगो से पैसे लुटाते देखा जा सकता है. परन्तु आप उपाय किये जातको से पूछे तो उन्हें कितना लाभ हुआ उनका जबाब नहीं में होगा, फलित ज्योतिष के सत्यता
विश्वास रखने वाली अबोध जनता को इस कुयोग के डराने परिणामो से भयभीत कर उनसे विविध संगत असंगत अनुष्ठानो द्वारा विपुल धन लेने बाले प्रपंच ज्योतिषी और साथ में अनेक अवसरवादी कर्मकांडी भी इस बहती गंगा में खूब लूट रहे है. आजकल यदि वर-कन्या में से किसी एक का जन्म काल सर्प योग में हुआ हो तो ये कुछ दम्भी विद्वान लोग इस योग की शांति करवाए बिना उनके विवाह संबंधो को कतई तैयार नहीं होते है. जबकि मिलान के लिए सिर्फ परंपरागत मिलान पद्धति (वश्य आदि
अष्ट कूटो की गुण संख्या) के अलावा विवाह के लिए काल सर्प योग शांति का कोई भी प्रमाण ये लोग नहीं दे पाते है. हमारे संपूर्ण प्राचीन ज्योतिष ग्रंथो में इस कुयोग का कोई उल्लेख नहीं है और वे इस कुयोग को मान्यता भी नहीं देते है. इस उपरोक्त विवेचन का सारांश यह है की जातक फलादेश में दुर्भाग्य योग के निर्णय का आधार काल सर्प नाम का कोई योग नहीं है, अपितु जातक के कुंडली के भाग्य भाव, भाग्येश, भाग्यकारक आदि की निर्बलता तथा मारक- क्रूर ग्रह दशा, अंतर दशा ही माने गए है, इस प्रकार हमारे संपूर्ण प्राचीन ज्योतिष साहित्य में काल सर्प नामक योग के अस्तित्व को पूरी तरह नकारते है. ज्योतिषाचार्य डॉ हिमांशु पंत ने कहा अब में आपको कुछ देशी,विदेशी हस्तियों (celibrities ) के नाम बताऊंगा जिनकी जन्म कुंडली में भी
तथाकथित कालसर्पयोग नामक कुयोग होते हुए वे अपने संपूर्ण जीवन में न तो निर्धन रहे,न संतान से वंचित रहे और न अल्पआयु रहे,वे अपने पूर्ण जीवन काल में धनवान, कीर्तिवान, संततीवान और आयुष्मान रहे तो इस प्रचारित कुयोग का उनके जीवन पर कुछ प्रभाव था क्या ? यह आप ही अपने विवेक से निर्णय लें. इन विशिष्ट व्यक्तियों की जन्म कुण्डलियाँ पद्मभूषण श्री सूर्य नारायण व्यास ,डॉ. बी.वि. रमण आदि प्रसिद्ध ज्योतिर्विदों
द्वारा संकलित कुंडली संग्रहों से ली
गई हे.
(१) सम्राट हर्षवर्धन (२) सम्राट अकबर (३) अब्राहम लिंकन (४) पंडित जवाहरलाल नेहरू (५) डॉ राधाकृष्णन (६) अशोक कुमार (७) रोनाल्ड रेगन (८)मार्गरेट थेचर (९) वी.शांताराम (१०) पद्मभूषण सूर्यनारायण व्यास (११)एन.डी.तिवारी (१२) धीरुभाई अम्बानी (१३) रवि शास्त्री (१४)अरुण नेहरू 15) रविन्द्र जैन,इत्यादि.यहाँ यह देखने योग्य हे की उपरोक्तविद्वानों ने इन कुंडलियो में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे कालसर्पयोग के बारे में नहीं कहते सिर्फ इनकी कुंडली में लक्ष्मी योग विशिष्ट व्यक्तित्व ही देखते क्योकि उन्हें पता है की ये लक्ष्मीवान थे, यह तो केबल एक सूची मात्र है, वास्तव में कालसर्प योग सेग्रषित सामान्य जनों की संख्या भारत में करोडो में है. क्या सभी इस कथित कुयोग से परेशान है मैने कालसर्पयोग नामक इस कुयोग को आपके समक्ष रखकर तथाकथित पाखंडी एवं धनलोलुप ज्योतिर्विदों व कर्मकांडियो द्वारा जनता को इस कुयोग से भयभीत एवं आतंकित करने के कार्य में लगाम डालने व जनता का
मेहनत का धन इस कुयोग से बचने के लिए अपव्यय न हो इसलिए एक प्रयास किया है मेरा मनना है की आपको जिस प्रकार की बीमारी हो उसी प्रकार के डॉक्टर के पास जाये विश्वास करे अंधविश्वास नहीं!

Related Post

विधानसभा अध्यक्ष प्रेम चंद्र अग्रवाल ने 2 लाख 60 हजार रुपए के आर्थिक सहायता के चेक जरूरतमंदों में वितरित किए

Posted by - June 8, 2020 0
ऋषिकेश 8 जून।लॉकडाउन के प्रारम्भ होते ही अभी तक विधानसभा अध्यक्ष अपने विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत लगातार प्रत्येक जरूरतमंद के…

विद्युत विभाग की लापरवाही हरिद्वार के व्यापारियों के लिए बनी जी का जंजाल

Posted by - June 15, 2020 0
15 जून 2020 हरिद्वार का दिल कहे जाने वाले मोती बाजार में जिस प्रकार से उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन द्वारा अंडर…

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल ने एक बार फिर किया कोरोना योद्धाओं को सम्मानित

Posted by - May 21, 2020 0
आज दिनांक 20-5-2020 को श्री सुनील कुमार मीणा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, नैनीताल के निर्देशानुसार श्री अमित श्रीवास्तव, अपर पुलिस अधीक्षक…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *